काश ! बारिश की बूंदों में घुल पाते हमारे भाव;
तो बह जाता अंतर्मन का संचित विषाद।
और बनाकर स्याही बहा देता धरा पर...एक दरिया।
अपने अल्फाज़ों और खामोशियों का ।
जिसमें दर्ज हो जाता हमारा भी अस्तित्व---
हर सड़क, हर गली, हर गलियारे में,
कुछ पत्तों पर, दरख़्तों की कुछ टूटी शाखाओं पर,
नीड़ का निर्माण करते बिखरे तिनके जोड़ते हुए,
हर शिल्पी परिंदों के पंखों पर.....!
कि है वजूद मेरा भी इस काया से परे ।
सागर-सा गहरा, आकाश-सा अनंत;
एक अस्तित्व; जो माप के फीतों से परे है।
काश ! बारिश थमने पर एक नई सुबह उतरकर;
साथ बहाकर लाती एक स्वच्छ, निर्मल, धीमी पवन।
और शायद हम पढ़ पाते चेहरों के पीछे छिपी;
बंद किताबों के पन्नों में सोते हुए शब्दों को।
जिनमें स्वच्छंद रूप से विचरण करती विचारों की रूहें...!
जो खामोशियों के बीच अक्सर अस्तित्व का अर्थ खोजती फिरतीं।
रचनाकार - निखिल वर्मा
कार्यरत - भारत मौसम विज्ञान विभाग, भारत सरकार।
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